मराठी गौरव
17 Nov 2009, 2332 hrs IST,नवभारत टाइम्स  
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एक मराठी मानुस को किस बात से गौरव महसूस होगा? अपने उस बेटे के आचरण से जिसने बिना किसी का दिल दुखाए पूरी दुनिया में अपने लिए करोड़ों प्रशंसक पैदा किए या उसके, जो दूसरे मराठी मानुस के मुंह पर ताला लगाने को उतावला है -तुम सिर्फ यह बोलो, वह मत बोलो, यहां खेलो, वहां मत खेलो, इसके साथ खेलो, उसके साथ मत खेलो। सचिन तेंडुलकर ने कहा कि मैं मराठी हूं, पर पहले हिंदुस्तानी हूं और मुंबई पूरे हिंदुस्तान की है। इस पर शिव सेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कहा कि सचिन ने मराठियों का अपमान किया है। वह कम बोलें और अपने खेल पर ज्यादा ध्यान दें।

ठाकरे साहब ने पैर पटकने की अपनी आदत के कारण कुछ ज्यादा ही सख्त पत्थर पर लात मार दी है। वह अकेले मराठी नहीं हैं। सचिन तेंडुलकर भी मराठी ही हैं, जो उनसे अलग विचार रखते हैं। लता मंगेशकर और ऊषा भोसले भी मराठी हैं, जिन्होंने हिंदी गीतों को अपनी साधना का क्षेत्र बनाया। बाबूराव विष्णु पराड़कर भी मराठी थे, जिन्होंने हिंदी की पत्रकारिता के प्रतिमान गढ़े। भीमराव आंबेडकर ने खुद को महाराष्ट्र का संविधान लिखने तक सीमित नहीं रखा, न ही बाल गंगाधर तिलक ने का आजादी का संघर्ष मुंबई तक सीमित रखा, हालांकि ये दोनों मराठी थे।

बाल ठाकरे का मराठी गौरव का जो फॉर्म्युला है, उसके अनुसार इन महापुरुषों के योगदान को भी लज्जाजनक बताना होगा। क्या ठाकरे साहब ऐसा कर सकते हैं? इस मुद्दे के व्यक्तिवादी पक्ष पर भी विचार किया जाए। जब बाला साहब माइकल जैक्सन को बुलाते हैं तो मराठी संस्कृति को आंच नहीं आती, लेकिन एक फिल्म के पोस्टर में करीना कपूर की पीठ दिखने पर उनके कार्यकर्ता पोस्टर फाड़ने लगते हैं। ठाकरे साहब खुद हिंदी में 'दोपहर का सामना' अखबार निकालें तो मराठी को चोट नहीं लगती, लेकिन कोई दूसरा हिंदी के पक्ष में कुछ बोल दे तो वे मराठी के नुकसान की बात उठाने लगते हैं। जो चीजें व्यक्तिगत रूप से उन्हें पसंद हैं, क्या केवल उन्हीं से मराठी मानुस की भावना और प्रतिष्ठा की रक्षा होती है, और उन्हें जो नापसंद है, उससे मराठी भावना का अनादर होने लगता है।

राजनैतिक रूप से भी वह मराठी भावना को समझने का दावा अकेले नहीं कर सकते। उन्हें लगता है कि मराठी मानुस उद्धव का नेतृत्व स्वीकार करेगा, लेकिन वह राज ठाकरे को वोट दे आता है, शरद पवार को वोट दे आता है, अशोक चव्हान को वोट दे आता है। जाहिर है, मराठी मानुस सिर्फ उनके साथ नहीं है। दूसरी तरफ, सचिन अगर दिल्ली के कोटला मैदान में तालियां बटोरते हैं तो मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भी उन्हें यूपी और झारखंड के खिलाड़ियों के साथ मिलकर खेलना होता है। मराठी या गुजराती या असमिया या बिहारी गौरव बढ़ाने के लिए हर नायक को अपने दायरे का विस्तार करना होता है। ठाकरे साहबान तो उसे और संकुचित बना रहे हैं। वह मुंबई को अपनी जेब में रखना चाहते हैं और विदर्भ का नाम नहीं लेना चाहते, जहां किसान आत्महत्या कर रहे हैं। लेकिन जो हिंदुस्तान सचिन पर गर्व करता है और जिसे मुंबई अपना लगता है, विदर्भ के लिए उसका कलेजा फटता है।
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